हेलो दोस्तों स्वागत है आपका हमारे इस ब्लॉग में आज की पोस्ट में हम रस और रसो के प्रकार के विषय में चर्चा करेंगे.....

रस क्या है?

ras ke prakar with examples,ras in hindi example


रस का शाब्दिक अर्थ है, आंनद। काव्य को पढ़ने या सुनने से जिस आनंद की अनुभुति होती है, उसे रस कहा जाता है।

पाठक या श्रोता के ? ह्नदय में स्थित स्थायी भाव ही विभावादि से संयुक्त होकर रस रूप में परिणत हो जाता है।
रस को काव्य की आत्मा /प्राण तत्व माना जाता है।

रस के अवयव अंग

रस के चार अवयव या अंग हैं- स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव व संचारी/व्यभिचारी भाव।

ras, types of ras


1- स्थायी भाव- स्थायी भाव का मतलब है प्रधान भाव। प्रधान भाव वही हो सकता है जो रस की अवस्था तक पहुँचता है। काव्य या नाटक में एक स्थायी भाव शुरू से अंत तक होता है। स्थायी भावों की संख्या 9 मानी गई है। स्थायी भाव ही रस का आधार है। एक रस के मूल में एक स्थायी भाव रहता है। अतवए रसों की संख्या भी 9 हैं, जिन्हें नवरस कहा जाता है। मूलतः नवरस ही माने जाते हैं। बाद के आचार्यो ने 2 और भावों को स्थायी भाव की मान्यता दी। इस प्रकार स्थायी भावों की संख्या 11 तक पहुँच जाती है और तदनुरूप रसों की संख्या भी 11 तक पहुँच जाती है।

2- विभाव- स्थायी भावों के उद्बोधक कारण को विभाव कहते हैं। विभाव 2 प्रकार के होते हैं- आलंबन विभाव व उद्दीपन विभाव।

आलंबन विभाव: जिसका आलंबन या सहारा पाकर स्थायी भाव जगते हैं आलंबन विभाव कहलाता हैं, जैसे नायक- नायिका। आलंबन विभाव के दो पक्ष होते हैं- आश्रयालंबन व विषयालंबन। जिसके मन में भाव जगे वह आश्रयलंबन तथा जिसके प्रति या जिसके कारण मन में भाव जगे वह विषयालंबन कहलाता है। उदाहरणः यदि श्री राम के मन में सीता माता  के प्रति रति का भाव जगता है तो राम आश्रय होंगे और सीता विषय।

उद्दीपन विभावः  जिन वस्तुओं या परिस्थितियों को देखकर स्थायी भाव उद्दीप्त होने लगता है उद्दीप्त होने लगता है उद्दीपन विभाव कहलाता है। जैसे- चाँदनी, कोकिल कूजन, एंकात स्थल, रमणीक उद्यान, नायक या नायिका की शारिरिक चेष्टाएँ आदि।

3- अनुभाव- मनोगत भाव को व्यक्त करने वाले शरीर विकार अनुभाव कहलाते हैं। अनुभावों की संख्या 8 मानी गई है-

1-स्तंभ,  2-स्वेद,  3- रोमांच,  4- स्वर-भंग,  5-कम्प,  6- विवर्णता,  7- अश्रु,  8- प्रलय ।


4- संचारी/व्यभिचारी भाव- मन में संचरण करनेवाले भावों को संचारी या व्यभिचारी भाव कहते हैं। संचारी भावों की कुल संख्या 33 मानी गई हैं-

1- हर्ष, 2-विषाद, 3-त्रास, 4- लज्जा, 5- ग्लानि, 6-चिंता, 7- शंका, 8- असूया, 9- अमर्ष, 10- मोह, 11- गर्व, 12- उत्सुकता, 13- उग्रता, 14- चपलता, 15- दीनता, 16- जड़ता, 17- आवेग, 18- निर्वेद, 19- धृति, 20- मति, 21- बिबोध, 22- वितर्क, 23- श्रम, 24- आलस्य, 25- निद्रा, 26- स्वप्न, 27- स्मृति, 28- मद, 29- उन्माद, 30- अवहित्था, 31- अपस्मार, 32- व्याधि, 33- मरण।  

        रस के प्रकार


रस                   स्थायी भाव

श्रृंगार रस             रति प्रेम
हास्य रस                हास
करूण रस             शोक
वीर रस                उत्साह
रौद्र रस                 क्रोध
भयानक रस           भय
वीभत्स रस           जुगुप्सा/घृणा
अद्भुत रस         विस्मय/आश्चर्य
शांत रस                निर्वेद
वत्सल रस            वात्सल्य रति
भक्ति रस            भगवद् विषयक रति /अनुराग

महत्वपूर्ण तथ्य-
  •  श्रृंगार रस को रसराज/रसपति कहा जाता है।
  • नाटक में 8 ही रस माने जाते हैं क्योंकि वहां शातं को रस में नहीं गिना जाता। भरतमुनि ने रसों की संख्या 8 मानी है।
  • सर्वप्रथम आचार्य भरतमुनि ने अपने ग्रंथ नाट्य शास्त्र में रस का विवेचन किया। उन्हें रस संप्रदाय का प्रर्वतक माना जाता है।
  • भरतमुनि के सूत्र- विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद् रस निष्पतिः विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी के संयोग से रस की निष्पति होती है।
  • रस - संप्रदाय के एक अन्य आचार्य, आचार्य विश्वनाथ ने रस को काव्य की कसौटी माना है। उनका कथन ‘वाक्य रसात्मकं काव्यम्‘- रसात्मक वाक्य ही काव्य है।
  • हिन्दी में रसवादी आलोचक हैं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल डॉ0 नगेन्द्र आदि। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने संस्कृत के रसवादी आचार्यो की तरह रस को अलौकिक न मानकर लौकिक माना है और उसकी लौकिक व्याख्या की है। वे रस की स्थिति को ‘ह्नदय की मुक्तावस्था‘ के रूप में मानते हैं। उनके शब्द हैंः लोक ह्नदय में व्यक्ति ह्नदय के लीन होने की दशा का नाम रस दशा है।  


हमारे द्वारा दी गयी जानकारी आपको पंसद आये तो, अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें।
साथ ही आपका कोई सुझाव हों तो, हमें कमेंट में जरूर बतायें।

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.

Previous Post Next Post